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मंगलवार, 5 जनवरी 2021

Ghazal - समझ से बाहर हो ऐसा राज़ बनो । अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' । Avaneesh Ki Ghazal, Shayari

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 6:49 am with No comments
समझ से बाहर हो ऐसा राज़ बनो
हर कोई दीवाना हो जाए ऐसा साज़ बनो

जब तलक धरती रहे हमारे मोहब्बत की दुहाई दे ज़माना
मैं शाहजहां बनूं, तुम मेरी मुमताज़ बनो

सियासत तो अमीरों के कोठे की तवायफ़ है
अहल-ए-सियासत हो तो मुफ़लिसों की आवाज़ बनो

यूं तो उजाला दिये भी देते हैं मगर
सारा जहां रौशन हो वो आफ़ताब बनो



शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

Ghazal - मयखाने चलो यारों - अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' । Maykhane Chale Yaron - Avaneesh Ki Ghazal, Shayari

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 7:35 pm with No comments
उन्हें छोड़कर किस तरह से जिएंगे
मयखाने चलो यारों, हम भी पिएंगे

Ghazal - मुझे रुलाओ ना - अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' । Mujhe Rulao Na - Avaneesh Ki Ghazal, Shayari

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 7:33 pm with No comments
मुझे रुलाओ ना, सावन का बादल हो जाऊंगा
मत हसाओ इतना मुझे, पागल हो जाऊंगा

Ghazal - मरीज़ - ए - इश्क़ हूं - अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' । Mareez - E - Ishq Hun ।

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 7:30 pm with No comments
मरीज़ - ए - इश्क़ हूं, ठीक हो जाऊं दुआ दो
हकीम आप हो, मन करे दवा दो या गला दबा दो

Ghazal - ज़माना शोर करता है तो शोर करने दो । अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' Zamana Shor Karta Hai Shor Karne Do । Avaneesh Ki Ghazal

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 7:21 pm with No comments
ज़माना शोर करता है तो शोर करने दो
मोहब्बत कर रहां हूं, थोड़ा और करने दो

सर्दी की अंधेरी रात में भी आपको, चाहत हमारी खींच लाई है 
आके गले मिलो, शीत पड़ रही है तो पड़ने दो

कितना ख़ुदग़र्ज़ हो गया है ये जमाना, जेहन में ये है कि
किसी का घर उजड़ता है तो उजड़ने दो

कोई किसी का अपना नहीं है इस जहां में
लोग बिछड़ना चाहते हैं, तो बिछड़ने दो

अगर है हौंसला तो जहां को घूम लेंगे हम
जलने वाले पर कुतरते हैं, तो कुतरने दो




बुधवार, 16 दिसंबर 2020

हवस मिटा सकूं, अब ऐसा कोई इश्क़ चाहिए मुझे । ग़ज़ल । अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' । Avaneesh Ki Ghazal, Shayari

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 5:09 am with No comments
आजिज़ आ चुका हूं रुहानी मोहब्बत से
हवस मिटा सकूं, अब ऐसा कोई इश्क़ चाहिए मुझे

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

तेरी मोहब्बत भी क्या मोहब्बत थी । ग़ज़ल । अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' । Avaneesh Ki Ghazal

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 3:56 am with No comments
तेरी मोहब्बत भी क्या मोहब्बत थी
तू जिंदगी में आई और मैं तबाह हो गया 

इक दौर था जब मैं बहुत शरीफ़ हुआ करता था, बहुत शरीफ़
हसीना - ए - जहीन से मोहब्बत हुई और बदनाम हो गया

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

फिर से दिसंबर लौट आया (ग़ज़ल) । अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' । Avaneesh Ki Ghazal, Shayari

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 5:29 pm with No comments
मेरा भिजवाया वो अम्बर लौट आया
तू ना आई, फिर से दिसंबर लौट आया

मैंने फूल फेंककर मारा उसके दिल पर
पत्थर दिल थी वो, टकराकर लौट आया

      अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत'

Full Comming Soon - 

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

खून में गर्मी है तो उबाल रखो (ग़ज़ल) अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' । Avaneesh Ki Ghazal

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 8:31 pm with No comments
खून में गर्मी है तो उबाल रखो
मगर अपनी जवानी संभाल रखो

जिगर में दम हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है
बस पर्वत लांघने का उछाल रखो

मोहब्बत करना कोई गुनाह नहीं है
मर्ज़ी उसकी भी हो, इसका ख़याल रखो

मुझसे नाराज़ हो, ये तो आपका हक है
मगर थोड़ी बहुत गुफ़्तगू तो बहाल रखो

मुड़कर देखा नहीं उसने जाने के बाद (ग़ज़ल) - अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत', Avaneesh Ki Ghazal

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 8:00 pm with No comments
मुड़कर देखा नहीं उसने जाने के बाद
नज़र आई भी तो गुज़रे जमाने के बाद

कहां तक करता उस शख़्स का पीछा मैं
मैं तो राख हो गया था जलाने के बाद

मेरे जां की अस्मत लूट ली गई, ख़बर मिली मुझको
गांव लौटा जब मैं, शहर से कमाने के बाद

कमाई थी अकूत दौलत उसने अपनी जिंदगी में
बहुत हल्के लग रहे थे वे, अर्थी उठाने के बाद

मेरे नाज़ुक हाथों से खिलौने छीने थे उसने बचपन में
मगर बड़े - बड़े सपने दिखाने के बाद

मोहब्बत सही है, मगर तेरी बराबरी कहां उससे
दो थप्पड़ लगाए मां ने, बताने के बाद

दिल बाग़ - बाग़ हो जाता है, मन हिचकोले खाता है
महबूब गले से लगता है जब सताने के बाद

टूट कर चाहो किसी को तो जानो कि लोग
कितना जलील करते हैं दिल लगाने के बाद

बिगड़ जाएंगे 'अवनीश' जालिमों के साथ रहकर
कौन डाटेगा मुझे, तेरे जाने के बाद


शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

Ghazal - ज़माने भर के दुश्मन हमदर्दियां जताने लगे गले लगाया भी तो छूरिया चलाने लगे | Avaneesh Kumar Mishra

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 10:29 am with No comments
ज़माने भर के दुश्मन हमदर्दियां जताने लगे
गले लगाया भी तो छूरिया चलाने लगे

जिनको हमने बचपन में चलना सिखाया था
हम ठोकर क्या खाए , चलना सिखाने लगे

गड्ढे खोदने की औकात नहीं है जिनकी इस जहां में
वो कम्बख़्त भी दरिया बनाने लगे

अच्छे दिनों में जो ऊंचे ख़्वाब दिखाते थे
दिन गिरे मेरे तो कमियां गिनाने लगे

उनके ऊंचे अल्फ़ाज़ से परिंद तक हिले नहीं
मैंने जुबां खोल दी सब उत्पात मचाने लगे
 
अब क्या बताएं की किस तरह से तन्हा हैं हम
जिन लोगों से लिपटते थे वे लोग ही सताने लगे

हम जिसे अपना समझकर खूब इतराते रहे
वो हमारे दरमियां की दूरियां बताने लगे

मां की गोद में महफूज़ हूं तुम फ़िक्र मत करना
ज़िक़्र किया उनसे तो वे प्यार जताने लगे

मेरी मौत हुई, मय्यत उठी, जनाजा निकला
वे जो अज़ीज़ थे, मेरे जिस्म को जलाने लगे

तुम्हारी नवाबी का क्या ख़ौफ है "अवनीश"
तुम चले तो जलने वाले भी कुर्सियां हटाने लगे

New Ghazal Lyrics - मैं वो सांप हूं इक वीरान जंगल का किसी को काट लूं तो लहर ना आए । Avaneesh Kumar Mishra

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 10:27 am with No comments
मजबूत इतना बनो की कहर ना आए
तिरपटा चलो कहीं शहर ना आए

मैं वो सांप हूं इक वीरान जंगल का
किसी को काट लूं तो लहर ना आए

तू ही मेरे हर इक मर्ज की दवा है
तू जो घुले तो मुझमें ज़हर ना आए

कर्म इतने अच्छे किए हैं हमने जीवन में
सीधे चलो कहीं बहर ना आए

तेरी जिंदगी तो दरिया है दरिया
सम्भल कर चलो कहीं नहर ना आए

इस क़दर हम तुम समा जाएं इक दूजे में
ज़माना दिया जलाकर देखे तो भी नज़र ना आए

हिम का अंश हो तुम मैं अवगुणों का नाश करता हूं

रविवार, 9 दिसंबर 2018

घुट - घुट के मर जायें | गजल | - अवनीश कुमार मिश्रा (लेखक , कवि)

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 9:27 am with No comments

तुझे छोड़कर हम कहाँ चल जायें
तुझे छोड़कर हम कहाँ चल जायें
घुट - घुट के मर जायें
हो हो घुट - घुट के मर जायें
बोलो...
घुट - घुट के मर जायें |

वो भी क्या ज़माने थे
जब तुम मेरे साथ रहती थी
वो भी क्या ज़माने थे
जब तुम मेरे साथ रहती थी |
छोड़ेंगे न तेरा साथ
हर पल कहा करती थी
छोड़ेंगे न तेरा साथ
हर पल कहा करती थी |

अब तेरे जैसा यार कहाँ पायेंगे
अब तेरे जैसा यार कहाँ पायेंगे

घुट - घुट के मर जायें
हो हो घुट - घुट के मर जायें
बोलो...
घुट - घुट के मर जायें |

हम करें भी तो प्यार किसे करें
जिससे हुआ , बस सपनों में

तुम्हारी निगाहों से
निगाहें मिलाते थे
तुम्हारी निगाहों से
निगाहें मिलाते थे |
तेरी वीरान गलियों में
बस हम अकेले जाते थे
तेरी वीरान गलियों में
बस हम अकेले जाते थे |

अब अवनीश किस गली को जायेंगे
अब अवनीश किस गली को जायेंगे

घुट - घुट के मर जायें
हो हो घुट - घुट के मर जायें
बोलो...
घुट - घुट के मर जायें |

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

जो दिल से आह निकले तो हमें सम्भाल लेना तुम (गज़ल) अवनीश कुमार मिश्रा

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 6:15 am with No comments

बाजी जीत कर भी बाजी हार जाना तुम
जो दिल से आह निकले तो हमें सम्भाल लेना तुम
हमें दिल से लगाना न सही
दिल से दो -चार थप्पड़ मार देना तुम

×××××××××××××××××××××××××××××××

जो दिल से आह निकले तो हमें सम्भाल लेना तुम
जो दिल से आह निकले तो हमें सम्भाल लेना तुम

×××××××××××××××××××××××××××××××

बाग - बगीचे में हर जगह याद आती तुम
बचपन की यादों में भी याद आती तुम
पल - पल मर रहा हूँ तेरी याद में
अवनीश के धड़कनों में भी याद आती तुम

×××××××××××××××××××××××××××××××

जो दिल से आह निकले तो हमें सम्भाल लेना तुम
जो दिल से आह निकले तो हमें सम्भाल लेना तुम

रविवार, 4 मार्च 2018

क्या पता था इश्क में ठोकरें खायेंगे(गजल)

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 7:47 am with No comments

क्या पता था इश्क में ठोकरें खायेंगे
इस तरह से मोहब्बत की सजा पायेंगे - 2

वो तो चली गयी हमें छोड़कर ,||
दो शब्द प्यार के तरस जायेंगे ||

क्या पता था इश्क में ठोकरें खायेंगे
इस तरह से मोहब्बत की सजा पायेंगे -2

मतलबों की दुनिया है पता चल गया ,||
चार दिन में सब जन गुजर जायेंगे ||

क्या पता था इश्क में ठोकरें खायेंगे
इस तरह से मोहब्बत की सजा पायेंगे -2

वो सुहाने जमाने गुजर ही गयें ,||
फूल राहों में मेरे न खिल पायेंगे ||

क्या पता था इश्क में ठोकरें खायेंगे
इस तरह से मोहब्बत की सजा पायेंगे -2

अवनीश कोशिश करे की भुुलाये उसे ,||
याद में उसके आँसू निकल जायेंगे ||

क्या पता था इश्क में ठोकरें खायेंगे
इस तरह से मोहब्बत की सजा पायेंगे -2

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

तेरे इश्क का वो सनम आया है (गजल)

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 6:29 pm with No comments

तेरे इश्क का वो सनम आया है
देखते देखते दिन गुजर आया है -2

जिन्दगी की ये मोती बिखरनी न थी ,||
चोट ऐसी लगी कि बिखर आया है ||

तेरे इश्क का वो सनम आया है
देखते देखते दिन गुजर आया है -2

आग इतना लगाके बदन में मेरे ,||
किसी और पर दिल तेरा आया है ||

तेरे इश्क का वो सनम आया है
देखते देखते दिन गुजर आया है -2

अपनी तिरछी नजरिया से घायल किया ||
दिल मेरा ये तभी से सिहर आया है ||

तेरे इश्क का वो सनम आया है
देखते देखते दिन गुजर आया है -2

अपनी सुन्दर सुरतिया से मुस्कायी वो ||
अवनीश कुमार मिश्रा का तब से ये दिल आया है ||

तेरे इश्क का वो सनम आया है
देखते देखते दिन गुजर आया है -2

नोट - यह गजल अवनीश कुमार मिश्रा यानि हमारे द्वारा लिखी गयी है इस गजल में अगर आप आवाज देना चाहते हैं तो इसके लिए आपको हमसे अधिकार की जरूरत होगी
अगर बिना अधिकार के इसका उपयोग किया तो यह अपराध होगा , चाहे आवाज दें या किसी प्रकार ब्लाग या वेबसाइट में प्रयोग करें |
इस गजल का सारा अधिकार हमारे पास है आप इसमें आवाज देने के लिए हमसे contact पेज पर जाकर massage करें |

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

हम तुम्हारे प्यार में क्या - क्या हुये सनम्

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 2:12 am with No comments

हम तुम्हारे प्यार में क्या - क्या हुये सनम्
क्या - क्या बनेगें और हम बता दो ये सनम्
हम तुम्हारे प्यार में पागल थे कभी
पागल न था पर पागल कहते थे सभी
फिर भी तुम्हारे गलियों में जाता रहा मैं
न पागल हूँ न पागल हूँ बताता रहा मैं
कितनो ने मारा मुझे चप्पल निकालकर
कुछ ने तो मारा मुझे ताने मारकर
पर दिल के मारे बेचारे को दर्द न हुआ
जब तूने मेरे दिल पे चोट दिया तो कह पड़ा कैसा है यह करम्
हम तुम्हारे प्यार में क्या - क्या हुये सनम्
क्या - क्या बनेगें और हम बता दो ये सनम्
कॉलेज की वो शरारतें अब याद आती हैं
धड़कन में ही रहती हैं भूले नहीं भुलाती हैं
यादें क्या होती हैं अब मुझे याद आ गया
पलके झपकता हूँ तो लगता है कोई आ गया
सपने में मैं कभी लम्बे ख्वाबों में खो जाता हूँ
फिर हरे , सुहाने मौसम में तेरी बाहों में सो जाता हूँ
मेरे लिए तेरे प्यार को देखकर अच्छा लगा
क्या पता जो हम देख रहे वो है मेरा भ्रम
हम तुम्हारे प्यार में क्या - क्या हुये सनम्
क्या - क्या बनेंगे और हम बता दो ये सनम्
भूल जाऊँगा सभी वो बीती बातें
भूल जाऊँगा सभी वो बीती रातें
जो जख्म दिया है तुमने उसको भी भूल जाऊँगा
नदी ,नालों में कूद जाऊँगा या फाँसी लगाकर झूल जाऊँगा
तेरे लिए जो कहे तो हद से गुजर जाऊँ
तू जो कहे तो कटार मार के मर जाऊँ
जो कुछ भी हो जाये बेवफा पर तुम्हें खबर नहीं होगी
दिल के मारे अवनीश कुमार मिश्रा कह पड़े मिला ऐसा क्यों जनम्
हम तुम्हारे प्यार में क्या - क्या हुये सनम्
क्या - क्या बनेंगे और हम बता दो ये सनम्

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शनिवार, 29 अक्टूबर 2016

मैं मर रहा हूँ तेरे याद में तो आपको क्या गम है (गजल)"दर्द-ए-दिल"किताब

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 7:18 pm with No comments
इश्क करती नहीं मुझे,

तो तेरी आँखे क्यों नम है

मैं मर रहा हूँ तेरे याद में तो आपको क्या गम है

खोया रात भर रहता हूँ ,

तेरे ही सपने हरदम देखा करता हूँ

जब करती नही प्यार मुझसे,दिल को कोसता हूँ

दिल धड़कने लगता है ,

जब तुझको देखता हूँ


इक बार गौर से देखो ,ये चेहरा क्या हसीन कम है

मैं मर रहा हूँ तेरे याद में तो आपको क्या गम है|

चैन छीना,ख्वाब छीना ,

नींद छीन लिया

चढ़ती जवानी में ये सनम,

तुमने दर्द दे दिया

गमों में अपनी आँखों को,दरिया बना ड़ाला

न जाने कितनी शराब ,

मैखाने में पी लिया

दर्दों-गमों के बाद भी,मुझे प्यार न तुमसे कम है

मैं मर रहा हूँ तेरी याद में तो आप को क्या गम है||

तेरे सुरूर के अंधेरे में,चलता रहा मैं

हाय कैसी जवानी मेरी,जवानी से जलता रहा मैं

मेरे पागलपन ने मुझे,दिया जलाने न दिया

शराबों का समुन्दर लिए,

रातभर चलता रहा मैं

कोई और न होगी जिन्दगी में,ये अवनीश कुमार मिश्रा 

की कसम है

मैं मर रहा हूँ तेरे याद में तो आपको क्या गम है|||


बुधवार, 7 सितंबर 2016

तूने दर्द दे दिया अरे वो बेहया(गजल)दर्द-ए-दिल"किताब"

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 3:04 am with No comments
तूने जो दर्द दिया वो सहते गये ,

तेरे चाहत के समुन्दर में बहते गये |

तेरी नफरत के समुन्दर ने ऐसी हिलोर मारी ,

उस समुन्दर के हिलोर में सब चाहते ढहते गये |

दब गया था गम के मलबे में फिर भी जी लिया

तूने दर्द दे दिया , अरे वो बेहया |

तेरे याद में अपने घर को मैखाना बना ड़ाला ,

शराबों की बोतलों को राहो में सजा ड़ाला |

रातें जागी मैनें न जाने कितनी ,

अपने स्वर्णिम् शरीर को पागल बना ड़ाला |

शराबों गमों के बदले तूने मुझे क्या दिया

तूने दर्द दे दिया , अरे वो बेहया ||

जिल्लत की जिन्दगी जीता रहा मैं ,

गम के आँसुओं को घुट - घुट पीता रहा मैं |

दरस न आयी तुम्हें मेरे वियोग रस पर ,

मोहब्बत में तेरे सुसुक - सुसुक के रोता रहा मैं |

अवनीश कुमार मिश्रा ने फरमाया,गम देने के लिए 

शुक्रिया

तूने दर्द दे दिया , अरे वो बेहया |||

रविवार, 10 जुलाई 2016

तेरी यादों में जिन्दगी गंवा रहा है कोई--(गजल)"दर्द-ए-दिल"किताब"

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 12:55 am with 1 comment

यादों में तेरे कितना मर रहा है ,

तेरी ही गम में आहे भर रहा है

तुम-सा न जग में दुनिया से कह रहा है कोई

तेरे अरमाँ में तकिया लगा रहा है कोई---

तेरी यादों में जिन्दगी गंवा रहा है कोई---|

इश्क से हारा हुआ वो ,

जमाने से ड़रा हुआ वो

गम का मारा हुआ

मैय्यत बना रहा है कोई

इश्क खातिर आँसू बहा रहा है कोई---

तेरी यादों में जिन्दगी गंवा रहा है कोई---||

तुमको बस जानेमन कहा था उसने ,

खींच के थप्पड़ उसे मारा था जो तुमने

डूब कर मर गया तुम्हारे गम में ,

तेरे मोहब्बत में जनाजे पर जा रहा है कोई

तेरे जज्बात में सुपुर्द-ए-खाक हो रहा है कोई---

तेरी यादों में जिन्दगी गंवा रहा है कोई---|||