यूं तो उजाला दिये भी देते हैं मगर
सारा जहां रौशन हो वो आफ़ताब बनो
मंगलवार, 5 जनवरी 2021
शुक्रवार, 1 जनवरी 2021
Ghazal - मयखाने चलो यारों - अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' । Maykhane Chale Yaron - Avaneesh Ki Ghazal, Shayari
Ghazal - मुझे रुलाओ ना - अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' । Mujhe Rulao Na - Avaneesh Ki Ghazal, Shayari
Ghazal - मरीज़ - ए - इश्क़ हूं - अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' । Mareez - E - Ishq Hun ।
मंगलवार, 10 सितंबर 2019
New Sad Shayari "Na Radha Aur Shayam Hain" By Avaneesh Kumar Mishra (Writer , Poet)
जब हमारी जिंदगी ही गुमनाम है ,
कुछ ऐसे जी रहा हूँ ,
जैसे राधा बिन श्याम हैं |
न राधा और श्याम हैं ,
हम तो इक सताये हुए हैं ,
हमारा तो प्यार भी गुमनाम है |
वो प्यार करती थी या नहीं,
पर अवनीश प्यार करता था |
रविवार, 10 फ़रवरी 2019
जिसे दिल से चाहा वो तो पत्थर दिल निकली | शायरी | New Hindi , Urdu Shayari | अवनीश कुमार मिश्रा (लेखक , कवि)
उसे जब - जब देखता हूँ
बस इक आह निकलती है ,
कि वो हमारी क्यों न हुई |
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पर अब सोंचने से क्या फायदा
शायद हमें ही न था ,
प्यार करने का कायदा |
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हम उन्हें पसंद न थे या वो डरती थी
पता नहीं क्यों वो मुझसे ,
मोहब्बत न करती थी |
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अब किसे इश्क की पड़ी है
जिसे दिल से चाहा वो ,
तो पत्थर दिल निकली |
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दिल ही था , वो भी बिखर गया
अवनीश के सामने अब ,
मौत भी खड़ी है |
सोमवार, 31 दिसंबर 2018
कुछ ऐसे जी रहा हूँ , जैसे राधा बिन श्याम हैं (दर्द भरी शायरी) - अवनीश कुमार मिश्रा लेखक , कवि
काहे की खुशी
जब हमारी जिंदगी ही गुमनाम है ,
कुछ ऐसे जी रहा हूँ ,
जैसे राधा बिन श्याम हैं |
न हम प्रेम की गलियों में बदनाम हैं
न राधा और श्याम हैं ,
हम तो इक सताये हुए हैं ,
हमारा तो प्यार भी गुमनाम है |
पता नहीं वो डरती थी या मैं डरता था
वो प्यार करती थी या नहीं,
पर अवनीश प्यार करता था |
सोमवार, 8 अक्टूबर 2018
जहाँ भी मिलती नजरें चार करती थी (शायरी) - अवनीश कुमार मिश्रा
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मैं जिसे प्यार करता था वो किसी और से प्यार करती थी
हम जिसे दिल में रखते थे वो औरो की बाहों में रहती थी
पता नहीं क्या सोंचती थी वो हमारे बारें में ,
जहाँ भी मिलती नजरें चार करती थी |
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नजरें चार करने से मेरी धड़कन नहीं काबू में
ऐसा लगता है कि मुझसे प्यार करती थी
वो एकटक देखना , हँसना , शरमाना ,
लगता था कि जैसे प्यार का इकरार करती थी
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तुझसे प्यार करने की न चाहत है अब मुझमें
वो क्या वक्त थे जब आँखें सौ बार लड़ती थी
अवनीश था जब तुम्हारे प्यार में पागल ,
आँखें तुम्हारी बेवफा औरों से मिलती थी |
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जहाँ भी मिलती नजरें चार करती थी (शायरी) - अवनीश कुमार मिश्रा
मैं जिसे प्यार करता था वो किसी और से प्यार करती थी
हम जिसे दिल में रखते थे वो औरो की बाहों में रहती थी
पता नहीं क्या सोंचती थी वो हमारे बारें में
जहाँ भी मिलती नजरें चार करती थी |
नजरें चार करने से मेरी धड़कन नहीं काबू में
ऐसा लगता है कि मुझसे प्यार करती थी
वो एकटक देखना , हँसना , शरमाना
लगता था कि जैसे प्यार का इकरार करती थी
जहाँ भी मिलती नजरें चार करती थी (शायरी) - अवनीश कुमार मिश्रा
मैं जिसे प्यार करता था वो किसी और से प्यार करती थी
हम जिसे दिल में रखते थे वो औरो की बाहों में रहती थी
पता नहीं क्या सोंचती थी वो हमारे बारें में
जहाँ भी मिलती नजरें चार करती थी |
नजरें चार करने से मेरी धड़कन नहीं काबू में
ऐसा लगता है कि मुझसे प्यार करती थी
वो एकटक देखना , हँसना , शरमाना
लगता था कि जैसे प्यार का इकरार करती थी
बुधवार, 20 जून 2018
दिल जला तो आँसू निकल आयेंगे (शायरी) - Avaneesh kumar mishra (writer,poet)
मुझे अपनी जिन्दगी से दूर कर दो
पर इतना मत दूर कर दो कि हमारी जिन्दगी यूँ ही सुनसान गुजर जाये
अपने दिल से हमें दूर कर दो
पर इतना मत दूर कर दो कि दिल टूटकर बिखर जाये
हमारी जिन्दगी यूँ ही सुनसान कर दो तुम
दिल में हमारे आग लग जायेगी
हमारे दिल के आगों से
तुम्हारा प्यार दिल से जल जायेगी
दिल जला तो आँसू निकल आयेंगे
तेरे दिल में खुशी खूब भर जायेगी
किसीे और से दिल लगा लेगी तुम
अवनीश को याद न फिर आयेगी
गुरुवार, 7 जून 2018
जिन्दगी में जिसने हमें हँसना सिखाया था(शायरी)
उसके चरणों की आहट ने हमें बेकरार कर डाला
सारा जीवन ही उसके लिए हमने बर्बाद कर डाला
वो आयी जिन्दगी में तो सपने खूब देखें हम
हमारी चाहतों का उसी ने खून कर डाला
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चाहतें थी जुदाई की मगर हम बेखबर ही थे
धार ऐसी थी कि इश्क से महरूम कर डाला
हमारी झुकी निगाहों पे भी उसको शर्म न आयी
हँसी भरी जिन्दगी को उसने सून कर डाला
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जिन्दगी में जिसने हमें हँसना सिखाया था
बेवफा ने उसी से हमको दूर कर डाला
बस नफरत ही भरी थी दिल में उसके
अवनीश के चाहने वालों का भी उसने खून कर डाला
शनिवार, 19 मई 2018
हम अंजान थे नजरों से उनके (शायरी) - अवनीश कुमार मिश्रा
हम अंजान थे नजरों से उनके
उनकी नजरें हमें गिराना चाहती थीं
जिन्हें समझा था कि गिरेंगे तो उठायेंगें
वही ताकते हमें मिटाना चाहती थीं
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हम सम्भले तो वे मात खा गये
जिन्होंने हमें गिराने का ख्वाब देखा था
हम संभले तो उनका गुरूर टूटा
जिन्होंने हमें मिटाने का ख्वाब देखा था
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हमसफर बनकर रह सकते थे मगर
उन्हें खुद पर बड़ा गुरूर था
वे अवनीश को नहीं चाहती थी तो
इसमें उनका क्या कुसूर था
सोमवार, 7 मई 2018
आँखें ही आँखों से दूर हो गई (शायरी)
आँखें भरी हमारी थी
वो खूब हँस रहे थे
बेशर्म है बेचारा
कह तंज कस रहे थे
यकीन न था वो वो ही थी
जिसके लिए ये नयन बह रहे थे
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जिनके लिए जिया था
वो दूर हो गई
मेरी लाचार आँखें
मजबूर हो गई
कभी आँखों से बातें हुआ करती थी
आज आँखें ही आँखों से दूर हो गई
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टूटकर बिखर गई
ख्वाब जो हमारे थे
आँसू भी बिखर गई
जिसे प्यार से संभाले थे
ये अवनीश थे जो संभल गये
अच्छे - अच्छे ठेके के सहारे थे
सोमवार, 2 अप्रैल 2018
तेरी जुल्फों में जो फूल है सनम् (शायरी)
तेरी जुल्फों में जो फूल है सनम्
मेरी देंह में जो खून है सनम्
पता नहीं क्यों मेरा खून
तेरे फूल की ओर दौड़ता है
हमें लगता है कि ये मेरी भूल है सनम्
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जो मेरा मन तुमपे मरता है
देखकर लोगों का दिल जलता है
दिलों के जलने से मेरा मन
तेरे पर और लगता है
हम नहीं मरते आपके लिए ,ये मन मेरा मचलता है
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बेवफाई किया मन ने तेरी तरह
अपने मन को कैसे समझायें हम
याद आती नजर में नजर ही तुम्हीं
मन को अपने कैसे बहलायें हम
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मेरा मन मेरा न रहा अपने मन का करता है
जो प्यार से देखले उसका ही नाम जपता है
उसे क्या पता मोहब्बत
क्या चीज है
अवनीश जानता है कि कितना दर्द होता है
शुक्रवार, 23 मार्च 2018
आशिक को सब कुछ लुटाना पड़ा(शायरी) - अवनीश कुमार मिश्रा
किसी को आसूँ बहाना पड़ा
किसी को जान गंवाना पड़ा
मत करना प्यार भाईयो
सबको प्यार की कीमत चुकाना पड़ा
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ये जो दुनिया है बड़ी जालिम है
आशिक को सब कुछ लुटाना पड़ा
हीर रांझां तो बस कुछ नाम हैं
लाखों को गर्दन कटाना पड़ा
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इश्क क्या ये तो बहुतो ने किया
चन्द लोगों को उसको निभाना पड़ा
बस प्यार से जिन्दगी कटती नहीं
टुकड़ों के लिए कमाना पड़ा
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अवनीश कुमार मिश्रा को भी इश्क हुआ
इश्क में फर्ज निभाना पड़ा
जिसको चाहा वो बेवफा निकली
फिर बीती बातों को भुलाना पड़ा |
बुधवार, 27 दिसंबर 2017
हम आँसू बहाते रह गये (शायरी)
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बुधवार, 13 दिसंबर 2017
हम चले थे मोहब्बत बाँटने (शायरी) "दर्दीला इश्क" पुस्तक
गुरुवार, 17 अगस्त 2017
सनम बेवफा सनम हो गई (शायरी)
इक दिन जब स्वप्न में तुम मेरी बाहों में सो गई ,
जमाना , रस्म क्या है सब भुला के खो गई |
मैं प्यार से तुमको सनम जानेमन कहा करता था ,
धोखा दिया स्वप्न ने सनम बेवफा सनम हो गई ||
