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शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

Ghazal - मरीज़ - ए - इश्क़ हूं - अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' । Mareez - E - Ishq Hun ।

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 7:30 pm with No comments
मरीज़ - ए - इश्क़ हूं, ठीक हो जाऊं दुआ दो
हकीम आप हो, मन करे दवा दो या गला दबा दो

Ghazal - ज़माना शोर करता है तो शोर करने दो । अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत' Zamana Shor Karta Hai Shor Karne Do । Avaneesh Ki Ghazal

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 7:21 pm with No comments
ज़माना शोर करता है तो शोर करने दो
मोहब्बत कर रहां हूं, थोड़ा और करने दो

सर्दी की अंधेरी रात में भी आपको, चाहत हमारी खींच लाई है 
आके गले मिलो, शीत पड़ रही है तो पड़ने दो

कितना ख़ुदग़र्ज़ हो गया है ये जमाना, जेहन में ये है कि
किसी का घर उजड़ता है तो उजड़ने दो

कोई किसी का अपना नहीं है इस जहां में
लोग बिछड़ना चाहते हैं, तो बिछड़ने दो

अगर है हौंसला तो जहां को घूम लेंगे हम
जलने वाले पर कुतरते हैं, तो कुतरने दो




बुधवार, 9 दिसंबर 2020

मुड़कर देखा नहीं उसने जाने के बाद (ग़ज़ल) - अवनीश कुमार मिश्रा 'मोहब्बत', Avaneesh Ki Ghazal

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 8:00 pm with No comments
मुड़कर देखा नहीं उसने जाने के बाद
नज़र आई भी तो गुज़रे जमाने के बाद

कहां तक करता उस शख़्स का पीछा मैं
मैं तो राख हो गया था जलाने के बाद

मेरे जां की अस्मत लूट ली गई, ख़बर मिली मुझको
गांव लौटा जब मैं, शहर से कमाने के बाद

कमाई थी अकूत दौलत उसने अपनी जिंदगी में
बहुत हल्के लग रहे थे वे, अर्थी उठाने के बाद

मेरे नाज़ुक हाथों से खिलौने छीने थे उसने बचपन में
मगर बड़े - बड़े सपने दिखाने के बाद

मोहब्बत सही है, मगर तेरी बराबरी कहां उससे
दो थप्पड़ लगाए मां ने, बताने के बाद

दिल बाग़ - बाग़ हो जाता है, मन हिचकोले खाता है
महबूब गले से लगता है जब सताने के बाद

टूट कर चाहो किसी को तो जानो कि लोग
कितना जलील करते हैं दिल लगाने के बाद

बिगड़ जाएंगे 'अवनीश' जालिमों के साथ रहकर
कौन डाटेगा मुझे, तेरे जाने के बाद


शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

Ghazal - ज़माने भर के दुश्मन हमदर्दियां जताने लगे गले लगाया भी तो छूरिया चलाने लगे | Avaneesh Kumar Mishra

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 10:29 am with No comments
ज़माने भर के दुश्मन हमदर्दियां जताने लगे
गले लगाया भी तो छूरिया चलाने लगे

जिनको हमने बचपन में चलना सिखाया था
हम ठोकर क्या खाए , चलना सिखाने लगे

गड्ढे खोदने की औकात नहीं है जिनकी इस जहां में
वो कम्बख़्त भी दरिया बनाने लगे

अच्छे दिनों में जो ऊंचे ख़्वाब दिखाते थे
दिन गिरे मेरे तो कमियां गिनाने लगे

उनके ऊंचे अल्फ़ाज़ से परिंद तक हिले नहीं
मैंने जुबां खोल दी सब उत्पात मचाने लगे
 
अब क्या बताएं की किस तरह से तन्हा हैं हम
जिन लोगों से लिपटते थे वे लोग ही सताने लगे

हम जिसे अपना समझकर खूब इतराते रहे
वो हमारे दरमियां की दूरियां बताने लगे

मां की गोद में महफूज़ हूं तुम फ़िक्र मत करना
ज़िक़्र किया उनसे तो वे प्यार जताने लगे

मेरी मौत हुई, मय्यत उठी, जनाजा निकला
वे जो अज़ीज़ थे, मेरे जिस्म को जलाने लगे

तुम्हारी नवाबी का क्या ख़ौफ है "अवनीश"
तुम चले तो जलने वाले भी कुर्सियां हटाने लगे

New Ghazal Lyrics - मैं वो सांप हूं इक वीरान जंगल का किसी को काट लूं तो लहर ना आए । Avaneesh Kumar Mishra

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 10:27 am with No comments
मजबूत इतना बनो की कहर ना आए
तिरपटा चलो कहीं शहर ना आए

मैं वो सांप हूं इक वीरान जंगल का
किसी को काट लूं तो लहर ना आए

तू ही मेरे हर इक मर्ज की दवा है
तू जो घुले तो मुझमें ज़हर ना आए

कर्म इतने अच्छे किए हैं हमने जीवन में
सीधे चलो कहीं बहर ना आए

तेरी जिंदगी तो दरिया है दरिया
सम्भल कर चलो कहीं नहर ना आए

इस क़दर हम तुम समा जाएं इक दूजे में
ज़माना दिया जलाकर देखे तो भी नज़र ना आए

हिम का अंश हो तुम मैं अवगुणों का नाश करता हूं

सोमवार, 4 नवंबर 2019

New Sad Shayari | दर्द भरी शायरी | वो आलीशान मकां किसका है - अवनीश कुमार मिश्रा

Posted by अवनीश कुमार मिश्रा on 9:40 am with No comments

तू है क्या यार तू मुझे रास्ता बताती है
अरे ये वही रास्ता है जहां मेरी सुबह -  शाम  होती थी

अब बस करना यार और कितना झूठ बोलोगे
हम से कहती हो की किसी और से तो नहीं बोलोगे

सब जानकर तू क्यों अंजान बनती है पगली
ये वही जगह है जहां तेरी - मेरी मुलाक़ात होती थी

इतने दिनों में बड़े किस्से सुने हैं तेरे
सुना है अब बेवफा हो गई हो

मेरे दोस्त कहते हैं कि तू गरीब है
तो ये बता कि जिस छत से तू अवनीश को देखती थी वो आलीशान मकां किसका है |

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